Friday, December 10, 2010

कसम


तेरी आंखों की कसम...तुझे न भूलूंगा
तेरी मुहब्बत में हर जख़्म सह लूंगा
जो आए आंधियां में रोक लूंगा
तेरे लिए ऐ सनम हर दर्द सह लूंगा
मुझे मालूम है तेरी कसमें
जो साथ दे तू मेरा
में हर जंग जीत लूंगा...

Tuesday, December 7, 2010

खोया-खोया चांद


चचा बतूलै का मुड आज कुछ उखड़ा सा लग रहा था....मुझे देखते ही घूरने लगे...थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़कर बोले अब तुम क्या सरकारी आदमी हो जो तुमसे बैर करुं....चचा क्या बात है..चची ने बेलन छाप दिए क्या....अबे बात क्या होगी....मेरा दिमाग खराब हो रिया है....कसम उड़ानझल्ले की....क्यों चची ने आज.....अबे चुप कर.....जब देखो चची...चची...क्या चची..चची लगा रिया है.....बात दरअसल यूं है कि देश में रिश्वत और भष्ट्राचार बढ़ता ही जा रिया है.....लेकिन कोई कुछ करने को तैयार नहीं दिख रिया है....राजा ने इतने पैसे हजम कर लिए कि उसकी चौदह पुश्ते आराम से बैठ कै खाएं तो भी खजाना कम न हो.....बात तो एकदम सही है चचा...पर तुम ही कुछ क्यों नहीं करते हम सब तुम्हारे पीछे हैं.....ये बात सुनते ही चचा अपनी औकात में आ गए.....धमाका छाप तंबाकू मुंह के अंदर डालते हुए.....टूटी खटिया पर यूं उचक के बैठे मानो....सरकार इनकी ही बन गई हो......अब फैंकने की बारी चचा की थी....अरे में तो कै रिया हूं कि ऐसी सरकार किस काम की जो अपनी जनता की बार-बार हजामत करती रहे.....मैने कल ही प्रधानमंत्री को फोन लगा कै कैया कि बहुत हो गया सरदार जी अब तो .....डारेक्ट फोन मिला डाला चचा तुमने......पांडू चिल्लाया....और तो क्या.....तो फिर क्या कहा उन्होने चचा....मैने कहा....अबे कैना क्या था.....कैया कि चिंता मत करो....चचा....जल्द ही सरकार इस मामले पर एक कमेटी बैठाएगी.....बस चचा रहने दो.....बहुत हो गई...ये कमेटियां.....मेरी समझ में इनका झोलझाल नहीं आता....तुम ही.लगे रहो....में निकल पड़ा....चचा खिसिया उठे....और मेरा हाथ पकड़ कर कहने लगे.एक बात और में इसके खिलाफ भूख हड़ताल पे बैठने जा रिया हूं....अपनी चची से कईयो कि रात को तीन बजे खाना लेके आ जावे.....ठीक है...चचा...और ये भी कह दूंगा कि खाने में जहर मिला के ले आए...कब तक पकते रहेंगें तुमसे.....कहकर में जोर से भागा......
                                                     आलम इंतिख़ाब

Monday, December 6, 2010

ख़ामोशी


किसी के लब जो ख़ामोश हों
बात कह जाते हैं..........
कहीं अजनबी भी कभी...
अपने हो जाते हैं.......
सलीका हो तो चलूं तेरे साथ वरना
हम तो बात पर ही....
मुतमईन हो जाते है....
वे तारे झोली में फैलाके दे रहे थे मुझको
हाथ फैलाउं भी तो कैसे....
वे जख़्म भी दे जाते हैं...
मेरी जरा सी भी बात उन्हे गंवारा नहीं
वो हर बात में अपनी ही कहे जाते हैं..
मेरा तसव्वुर है...या फिर मेरा माज़ी अपना
कोई उन्हे समझाए तो वो क्यूं बड़बडाते हैं...
                      आलम इंतिख़ाब





हौंसला

मैने सुना कि तुम रात सो नहीं पायी....
सारी रात देखती रहीं मेरा ही ख़्वाब
चेहरे पे तुम्हारे दिखाई दी.......
शबनम की कुछ बूंदें.....और चमक
ये क्या मेरा नसीब था या फिर.....
तुम्हारा बेपनाह हुस्न.......कुछ भी हो..
अब जब राज खुल ही गया...तो फिर
मुझसे नजर क्यों चुरा रही हो.......क्या
हौंसला नहीं है....कुछ कह पाने का.....
क्या हौंसला नहीं है....जमाने से लड़ जाने का
देखो शाम ढलने को है....शमां जलने को है..
कुछ तो कह दो...ताकि मैं भी देख सकूं...
तुम्हारा ख्वाब..में सोना चाहता हूं सारी रात...
                          आलम इंतिख़ाब अंसारी

आपबीती......

लेखन का शौक बचपन से ही था। आए दिन कुछ न कुछ लिखने की आदत ने अख़बार से दोस्ती करा दी...आखिर अख़बार ही वो जरिया था जिसमें लेखन के जरिए लोगों तक अपनी बात पंहुचाई जा सकती थी। 1997 में अमर उजाला में और अंत में छोटा लेकिन प्रभावशाली लेख छपा...लोगों ने पढ़ा तो हौसलाअफ़ज़ाई की...और लिखने की प्रेरणा मिली..समय बीतता गया मैं लिखता गया...आखिर कुछ अच्छे लोगों की सलाह पर जर्नलिज्म को अपनाने की सोची। लगता था कि कितना अच्छा पेशा है आम लोगों की आवाज़ बनने का इससे अच्छा कोई दूसरा पेशा नहीं....यही सोचकर जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली से जर्नलिज्म का डिप्लोमा किया।
         जब तक पढ़ाई चलती रही तब तक तो सब ठीक-ठाक रहा लेकिन जैसे ही कोर्स पूरा किया और इंटर्नशिप करनी चाही तो पता चला कि अगर आपके चैनल और अख़बार में लिंक नहीं हैं तो आप इंटर्नशिप तो क्या अंदर घुस भी नहीं सकते। कई महीने चैनल और अख़बार के दफ़्तरों के चक्कर काटने के बाद इंटर्नशिप मिली। मन में तय था कि काम पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना है। कोई भी काम मिले करना है तो करना है...आज उसी का फल है कि में एक न्यूज चैनल में काफी कम समय में ही असि.प्राडयूसर बन गया हूं। रोजाना मेरे मन में कई नये आइडियाज आते हैं और मेरी कोशिश है कि एक बेहतर काम को अंजाम दिया जाए।
         चूंकि जर्नलिज्म में लेखन बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए लेखन का प्रभावशाली होना बेहद आवश्यक है। चाहे टी.वी.हो या अख़बार बिना प्रभावशाली लेखन के आप ज्यादा दूर नहीं जा सकते। मेरी आज भी कोशिश होती है कि कुछ न कुछ लिखता रहूं..बड़े और अच्छे लोगों से दोस्ती के कारण ही में अपना काम बेहतर ढंग से कर रहा हूं। मैने अपने सामने कई ऐसे लोगों को देखा है जिन्होने इस फील्ड को अलविदा कह दिया। और फील्ड से इतर ये पूरी मेहनत मांगता है...  
           

Friday, December 3, 2010

औंस


नंगे पांव औंस पे चलना
उनका संवरना उनका मचलना
मौसम भी ये कैसा मौसम
शायद मिलना और बिछड़ना
देखा उनको सुबह सवेरे
रात कटी न कटे न अंधेरे
लब पे तबस्सुम जुल्फ़ घनी सी
आंखों मे काजल रुत बदली सी
देख के उनको रुक जाए मौसम
अब तो शायद फिर जाए मौसम
        आलम इंतिख़ाब........

Wednesday, December 1, 2010

ख़्वाब


 ख़्वाब देखा है मैने...ख़्वाब ही था शायद
वो तुम ही तो थीं..मटमैली चादर ओढ़े हुए
याद है मुझे मेरा ख़्वाब जब तुम
मेंहदी लगे हाथों से चुल्लू भर कर
पी रहीं थीं चश्मे का पानी....
और मुझे देखकर आया जब
तुम्हारे होठों पर हल्का सा तबस्सुम
लगा जैसे आसमां आ गया हो जमीं पर
मुझे मालूम है कि तुम हो कहीं पर
कैसे और किनसे कहूं अपना ख़्वाब
मुझे मालूम है हंसेंगें लोग मेरी तन्हाई पर
और कहेंगें तुम कहीं पागल तो नहीं
जानता हूं में ये अच्छी तरह
कुछ ख़्वाब होते हैं झूठे तो कुछ सच्चे भी
काश ऐसा हो के मेरा ख़्वाब भी सच्चा निकले...
                          आलम इंतिख़ाब