Saturday, May 28, 2011

फ़ूल....


न जाने कितनों के ख़्वाब टूटे देखे हैं मैने
पर अपना ख़्वाब टूटे जाने से बेहद डरता हूं मैं
तेरी तस्वीर को सीने से लगाए
न जाने क्यों बहुत रोता हूं मैं
वो तेरे घर के रस्ते में कितने फ़ूल बिख़रे थे
उठाना भी जो चाहा तो कुचल डाला उन्हे तुमने

Thursday, May 26, 2011

मजाक....


क्यों रे चंपू कै के रियो थो कल जब मैं गाड़ी में बैठो थो,कुछ न मामू वो तो मैं मजाक कर रयो थो,अबे तेरी ऐसी कम तेसी इतना सिरियस मजाक कर रयो थो और वो भी मुझसे,न मामू बात दरअसल यो है के मैं गुस्से में थो,मेरे गुस्से के आगे न जाने कहां से तुम आ गयो तो,तो इस चक्कर में मैं बक डालो...मगर पैट्रोल को गुस्सो मुझपे क्यों उतार रयो थो हिम्मत है तो सरकार पर उतार...पुलिस पर उतार पता चल जाएगो...सारो गुस्सो काफ़ूर हो जाएगो जब पिछवाड़े पर बेंत से सिकाई होगो...ऐसी बात न है मामू मैं तो समाजसेवक हूं...अबे जा हवा आने दे जब से अन्ना हज़ारे अनशन पर बैठो है सारे आवारा किस्म के लोग यही बको फ़िर रहो है....देख आइंदा से मेरे को कुछ कयो तो तेरी खैर नहीं समझे इतना मारुंगो के तेरा...तेरा क्या मामू एक मुहल्ले में तुम ही तो हो जिससे में अपने दिल की बात शेयर करुं हूं....आपकी कितनी इज्ज़त करुं हूं ये मेरा दिल ही जानो है....अबे चल बकवास करने की डिग्री लियो फिरतो है....काम धाम तो कुछ है नहीं दिन भर आवारागर्दी करो है कुछ काम क्यों न ढूंढ रयो हो....कबतक चलेगो ऐसे....करुगों मामू काम भी करुंगो और नाम भी करुंगो....बस एक बार मेरी शादी हो जाने दो....अबे किसे अपनी बेटी की किस्मत फुड़वानी है....तो तुम फुड़वा दो न मामू....ख़बरदार जो एक लफ़्ज़ भी कहा.....अच्छा मेरे प्यारे मामू एक बात बताओ ये पैट्रोल को दाम एकदम से 5 रुपए बढ़ गयो है आपको टेंशन न होवे है....होवे है बेटा टेंशन भी होवे है पर क्या कर सकें हैं इसमें हमारा क्या बस है ये तो सरकार के हाथ में है....हम तो झेल ही सकते हैं बस...हां मामू वो तो है तुम कित्ता झेलो हो मुझे सब मालूम है....क्या मतलब...मतलब ये के मंहगाई के इस दौर में तीन-तीन बेटियां पालना बड़ी हिम्मत को काम है...मे तो दाद देतो हूं तुम्हारी....चल अच्छा निकल अब मुझे जाने दे....कहां मामू...जहन्नुम में....चलेगो....न मामू बस तुम ही जाओ....मैं शादी करके आउंगो.....

Monday, May 23, 2011

संवेदना…..


पहाड़ काट के सड़क बनाई,पेड़ काटकर छानी
फ़िर भी काम न आया देखो,पानी और जवानी
रोज़-रोज़ के अंधियारे में जीना मरना कैसा
बदले मौसम रुत भी बदले,हवा चले सुहानी
जंगल में ये मंगल कैसा,है कैसा है ये शोर
बात-बात पर मुंह ताके हैं,है किसका ये ज़ोर
ख़ुद ही किस्मत बदलेगी जब,हो मजबूत इरादा
कितने आए कितने गये पर वादा ही रहा वादा
जो भी बातें करनी हों वो करके देखो तुम
इस पहाड़ की रौनक पर क्यों नज़र लगाओ तुम
सारी नदियों पर तुमने कितने बांध बना डाले
पानी की अविरल धारा को कितने पैमाने दे डाले
चंद रुपयों की ख़ातिर तुमने,किया कैसा खिलवाड़
रोजाना ही आते यहां भुकंप और जंजाल
अब भी शायद सूरत बदले जो तुम बदलो आज
फ़िर से शुरु करो पहाड़ों का समुचित विकास    

Monday, May 2, 2011

आंतकवाद का जिम्मेदार कौन?


पाकिस्तान के ऐबटाबाद में एक शानदार हवेली में छुपकर रह रहे अलकायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को एक हमले में अमेरिकी फौज ने मार गिराया। क़रीब दस सालों से आंतक का पर्याय बन चुके ओसामा बिन लादेन को अमेरिका ने ढुंढने में ही सालों लगा दिए,अफ़गानिस्तान की पहाड़ियों से लेकर पाकिस्तान के हर उस कबाईली इलाके में ओसामा को खोजा गया जहां उसके मिलने की गुंजाइश थी,पर अफ़सोस कि वो अमेरिका को हर बार चकमा देता रहा। अगर कहा जाए तो अकेले ओसामा और उसके साथियों ने अमेरिका की नाक में दम कर दिया,और उसको हर बार की तरह ठेंगा दिखाते रहे।जार्ज बुश से लेकर बराक ओबामा तक से अमेरिका और उसके हमसाया मुल्क सवाल दर सवाल पूछते रहे कि आख़िर ओसामा को ज़मीन खा गई या आसमां निगल गया। हर बार की तरह अमेरिका अपने लोगों को भरोसा देता रहा कि जल्द ही ओसामा का काम तमाम कर दिया जाएगा। ऐसा नहीं था कि अमेरिका को शक नहीं था कि ओसामा पाकिस्तान के इर्द-गिर्द हो छुपा हो सकता है,लेकिन पाकिस्तान पर उसकी मेहरबानी न जाने क्यों बनी रही। पाकिस्तान भी अमेरिका की चापलूसी करके उसे हर बार भरोसा दिलाता रहा कि ओसामा उसके मुल्क में नहीं है,और अगर है तो फ़िर उसे मार दिया जाएगा।
     ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने से एक बात तो साफ़ तौर पर जाहिर हो गई कि पाकिस्तान दहशतगर्दी को बढ़ावा देने में सबसे आगे है। उसे खुद नहीं मालुम कि उसके यहां कितने दहशतगर्दाना संगठन काम कर रहे हैं। ओसामा के मारे जाने के बाद पाकिस्तान से शायद हर मुल्क सवाल करेगा,इसमें सबसे आगे अमेरिका ही होगा। हालांकि अमेरिका खुद हैरत में है कि पाकिस्कान में ओसामा को होने के बावजूद भी पाकिस्तान लगातार उसे बहलाता रहा। आशंका तो ये भी की जा रही है कि पाकिस्तानी खुफ़िया ऐजेंसी आईएसआई को सब मालुम था,उसे ये भी मालुम था कि ओसामा कहां और कब से यहां पनाह लिए हुए है। अगर ऐसा न होता तो शायद अमेरिका की नज़रों से ओसामा का अबतक बचना नामुमकिन था,क्योंकि 9/11के हमले के बाद अमेरिका ओसामा को ज़ख्मी जानवर की तरह ढुंढ रहा था। और इस अभियान को लेकर उसने न जाने अपने कितने सैनिक और अरबों डालर पानी की तरह बहा दिए।अमेरिका ओसामा को अपना नंबर वन का दुश्मन मानता था,साथ ही अमेरिका अपनी जनता को बार-बार ये भरोसा भी दिलाता रहता था कि ओसामा को वो जल्द ही ढूंढ निकालेगा और उसे उसके किए की सजा देगा।
     अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में ओसामा के मारे जाने के बाद अपनी पीठ थपथपाते हुए ऐलान किया कि दहशत के बादशाह का ख़ात्मा हो चुका है,और जो अमेरिका कहता है वो कर दिखाता है। लेकिन इस बीच बराक ओबामा भूल गए कि ओसामा को इतना बड़ा दहशतगर्द बनाने में जिसका सबसे बड़ा हाथ है वो खुद अमेरिका है। सऊदी अरब का एक कारोबारी कैसे अमेरिका की शह पर दुनिया का सबसे मोस्टवांटेड आंतकी बन गया खुद अमेरिका भी हैरान था। अमेरिका को शायद गुमान भी नहीं होगा कि उसकी आस्तिन का सांप जिसे ख़ुद उसने दूध पिलाकर पाला पोसा वो उसे ही डस लेगा। दरअसल अमेरिका अपने फ़ायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ये शायद कम लोग ही जानते हैं। आंतकवाद को लेकर हो-हल्ला मचाने में उसका कोई सानी नहीं,लेकिन दूसरे मुल्कों में जब आंतकवादी हमला होता है तो अमेरिका सिर्फ़ झूठी तसल्ली देकर पल्ला झाड़ लेता है।
      हिंदुस्तान की आर्थिक राजधानी मुंबई में हुए 26/11 के हमले के बाद अमेरिका ने भारत को झूठी तसल्ली के अलावा कुछ नहीं दिया,यहां तक कि खुद बराक ओबामा हिंदुस्तान की यात्रा पर भी आऐ और मुंबई भी गए,पर अफ़सोस उन्होने एक बार भी खुलकर पाकिस्तान को नहीं चेताया। सारी दुनिया जानती है कि हिंदुस्तान आंतकवाद से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा है। ये नाग रह-रहकर उसे डसता रहता है। पर कभी भी अमेरिका ने खुलकर इसकी निंदा नहीं की,उसने कभी भी पाकिस्तान को चेतावनी नहीं दी कि भारत में दहशतगर्दी को बढ़ावा न दे और आंतकवादियों की घुसपैठ न कराऐ। अब जब ओसामा पाकिस्तान में ही मारा गया है तो नि:संदेह ये बात कही जा सकती है कि आंतकवादियों को पनाह देने में पाकिस्तान का कोई सानी नहीं है। खुद पाकिस्तान भी हैरान है कि क्या से क्या हो गया। तोतली जबान में ही सही वो अमेरिका को सफ़ाई दे रहा है कि उसे नहीं मालुम था कि ओसामा उसके यहां छुपा बैठा है। लेकिन इससे उसका झूठ छुपने वाला नहीं,अमेरिका सबकुछ जानते हुए भी अंजान नहीं था। वो जानता था कि ओसामा जैसे न जाने कितने आंतकी पाकिस्तान में पनाह लिए हुए हैं इसलिए उसने पाकिस्तान पर भरोसा न करके खुद ही इस आपरेशन को अंजाम दिया। अब खिसियानी बिल्ली की तरह पाकिस्तान सफ़ाई दे रहा है कि अमेरिका ने बिना इजाज़त के इस आपरेशन को अंजाम दिया,और अब वो इसकी शिकायत यूएनओ में दर्ज कराएगा।
      ओसामा बिन लादेन को भले ही मार गिराया गया हो लेकिन एक सवाल हर किसी के जेहन में कौंध रहा है कि ठीक अमेरिका में होने वाले चुनाव से ऐन पहले इस आपरेशन को अंजाम दिया गया ऐसा क्यों और किस वजह से किया गया,क्या इसमें कोई अमेरिकी पालिसी है या फ़िर ये सामान्य प्रकिया। लेकिन जहां तक बात ओबामा की है तो वो अपनी लोकप्रियता में आई कमी से हैरान हैं,अमेरिका का राष्ट्रपति बनते ही उन्होने जो वादे किए उसमें वो कहीं भी खरे नहीं उतर सके,पिछले साल अमेरिका में छायी आर्थिक मंदी से जब अमेरिका में लाखों लेग बेरोजगार हो गए और साथ लोगों के लाखों डालर डूब गए तब बराक ओबामा कुछ दिनों के लिए सबकुछ भूल गए थे। वो ये भी भूल गए थे कि अमेरिका की फौज अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में ओसामा को ढूंढने में लगी है। लोगों ने सवाल किया कि अरबों डालर युद्ध के नाम पर बहाना कहां कि समझदारी है।
     अगले साल अमेरिका में राष्ठ्रपति के चुनाव होने वाले है,ओबामा ऐलान कर चुके हैं कि वो अगला चुनाव भी लड़ेगें,पर किस मुद्दे पर खुद उन्हे भी नहीं मालुम। अब कुछ ऐसा होना चाहिए जिससे वो फ़िर से अपना झंडा लहरा सकें,उन्होने रणनीति बनानी शुरु कर दी कि कैसे वापस रिंग में लौटा जाए। अब उनकी डूबती नैय्या कोई पार लगा सकता था तो वो सिर्फ़ ओसामा बिन लादेन ही था,शक था लेकिन पुख़्ता सबूत नहीं। अमेरिकी खुफ़िया ऐजेंसी सीआईए को जैसे ही मालुम हुआ कि ओसामा के पाकिस्तान में ही छुपे होने की उम्मीद है,ओबामा की बांछें खिल गईं। ओबामा ने मौके को हाथ से न जाने दिया और कैसे भी हो ओसामा को मार गिराने का हुक्म दिया साथ ही ये हिदायत भी दी कि पाकिस्तान को इसकी कानों-कान भी ख़बर नहीं होनी चाहिए। किस्मत ने उनका साथ दिया और अमेरिकी फौज ने बिना पाकिस्तान की मदद के ओसामा को ढेर कर दिया और उसे दफ़नाने में इतनी जल्दबाजी दिखाई जितनी कि इराक में सद्दाम हुसैन को फ़ासी पर लटकाने में दिखाई थी।
     अब भले ही पाकिस्तान अमेरिका को लाख सफ़ाई दे कि उसे ओसामा के छुपे होने की कोई ख़बर नही थी,भले ही अमेरिका उसे कहे कुछ न लेकिन अब शायद पाकिस्तान पर भरोसा करना जायज़ नहीं है। लगे हाथ भारत को भी अपना पत्ता खोल देना चाहिए उसे जोर-शोर से ये मांग दोहरानी होगी कि मुंबई हमले को मुल्जिम उसके यहां पनाह लिए हुए हैं और सरेआम घुम रहे हैं। पाकिस्तान पर दबाव बनाने का ये अच्छा मौका है भारत को इसे किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहिए.अब जब पूरी दुनिया को सबूत मिल गया है कि पाकिस्तान में ओसामा ही नहीं न जाने कितने आंतकी पनाह लिए हुए हैं और फल-फूल रहे हैं।        

Friday, April 29, 2011

दरमियां.....


कब तक क़याम रहेगा जनाब का देहली में....यही दो रोज़....गुजिश्ता काफ़ी रोज़ से सोच रहा था कि देहली में आपसे मुख़ातिब होउं लेकिन मसरुफ़ियात की वजह से आपसे न तो मुलाकात हुई और न ही कोई गुफ़्तगु.....अब सोच रहा हूं के देहली में क़याम के दौरान आपसे मिलकर पुरानी यादों को एक बार फ़िर से ताज़ा कर लिया जाऐ.....जी बेहतर....कब तशरीफ़ ला रहे हैं जनाब देहली में.....आइंदा हफ़्ते....जी बेहतर... आपका यहां कोई बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है.....कौन है...ज़रा हमें भी तो मालुम चले....बस इसे सीक्रेट ही रहने दें...जब आप ख़ुद मुख़ातिब हों तो कहिए...फ़िर भी ज़रा बताओ तो सही..... कम-अज़-कम इस बहाने आप हमारे ग़रीबख़ाने पर कुछ दिन तो क़याम कर पाऐंगें..... अरे कालेज के दिनों में एक तुम ही तो थे जिसने मेरी ज़िंदगी को बदलने में अहम रोल अदा किया.....तो ठीक है देहली रवाना होने से क़ब्ल में आपको इत्तला कर दूंगा....बेहतर-बेहतर....अल्लाह हाफ़िज़....
     तनवीर से ऐहसान की बड़ी दोस्ती थी....ये दोस्ती उस वक्त परवान चढ़ी जब तनवीर और ऐहसान देहली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में कैंटिन में मिले...दोनों की मुलाकात मरियम ने करवाई थी....तनवीर मास काम कर रहे था और ऐहसान फ़ाइन आर्टस का कोर्स...तनवीर के अब्बा का देहली में एक्सपोर्ट का काम था....किसी हीरो से कम नहीं था तनवीर.. कालेज के दिनों में मरियम और तनवीर एक दूसरे के काफ़ी क़रीब थे....लेकिन फाइन आर्ट में होने की वजह से ऐहसान और मरियम का आपस में काफ़ी मिलना जुलना होता था। वक्त गुज़र रहा था और तनवीर के अब्बा उसका शादी को लेकर फ़िक्रमंद होने लगे थे...चूंकि तनवीर की अम्मी की तबियत अक्सर नासाज़ रहती थी....मरियम से जब तनवीर ने शादी के बारे में बताया तो उसने इंकार कर दिया वो अभी शादी नहीं करना चाहती थी....लेकिन तनवीर को शादी की जल्दी थी....ख़ैर बात आई गई हो गई....तनवीर को लगा कि कहीं मरियम ऐहसान की वजह से तो शादी से इंकार नहीं कर रही.....तनवीर ऐहसान से कटने लगा....मरियम और ऐहसान को साथ-साथ देखकर वो सुलग जाता..उसे लगता कि राह का रोड़ा ऐहसान ही है....और एक दिन तनवीर ने सबके सामने ऐहसान को ख़री-खरी सुना दी.....ऐहसान हैरानगी से तनवीर को देखता रह गया...उसे समझ ही नहीं आया कि आख़िर माज़रा क्या है....वो कभी मरियम की तरफ़ देखता तो कभी तनवीर की तरफ़....मरियम भी वहां से दबे पांव निकल गई....ऐहसान ने ख़ामोश रहकर ही तनवीर को जवाब दे दिया..... खैर तनवीर की शादी रिहाना से हो गई....शादी में ऐहसान का न होना....इस बात का सबूत था तनवीर और ऐहसान के रिश्ते कितने तल्ख़ हो चुके थे....हालांकि ऐहसान खुद नहीं समझ पा रहा था कि तनवीर को आख़िर हो क्या गया है...उधर ऐहसान कोर्स पूरा कर दुबई निकल गया....वक्त बीतता गया लेकिन कभी हिंदुस्तान न आना हुआ.....अरे मरियम कैसी हो...जी रही हुं आप बताऐं....मुझे मुआफ़ कर दो मरियम उस दिन मैं बहक गया था....मुझे लगा शायद तुम्हारे और ऐहसान के दरमियान कुछ....कितने ग़लत थे तुम.....अरे मुझे शादी नहीं करनी थी....तो तुमने ऐहसान को क्यों बदनाम किया....सिर्फ़ इसलिए कि वो मेरे साथ कोर्स करता था....मुझे एक बार प़िर मुआफ़ कर दो मरियम मैं..... उससे रहा न गया दोस्ती की ख़ातिर उसने ऐहसान के वालिद से उसका फोन नंबर लिया...और फ़िर दो दोस्त आपस में ऐसे बात करने लगे जैसे उनके दरमियान कुछ हुआ ही न हो....तुम बिल्कुल नहीं बदले ऐहसान और तुम भी तो नहीं बदले तनवीर....यार मुझे मुआफ़ कर दो....मैने तुम्हारा दिल दुखाया है.....अच्छा ये बताओ शादी की अभी तक या नहीं....अभी तक तो नहीं ....फ़िर ठीक है.....क्यों क्या हुआ...अरे यार मरियम....मरियम वो मरियम...हां यार ...वो तेरे इंतज़ार मैं कुंवारी बैठी है अबी तक...अबे कैसी बातें करता है.....जोर से हंसकर गाड़ी मैं बैठ गऐ दोनों ....और बता सिर्फ़ दो दिन के लिए ही आया है यार....ऐसे कैसे चलेगा..तेरी भाभी और बच्चे कितनी बेसब्री से तेरा इंतज़ार कर रहे हैं....शायद तुझे नहीं मालुम....बातों बातों में कब घर आ गया मालुम ही नहीं चला....ये रेहाना है...हमारी शरीके-हयात और ये तुफैल और ये नाजिश....बेटे अंकल को सलाम करो....कैसी हैं भाभी आप....जी अच्छी हूं....अच्छा फ्रेश हो जाओ...फ़िर नाश्ता करते हैं....ओके.....उसके बाद तुम्हे किसी से मिलवाना भी है...किससे....मरियम से अमां रहने दो मियां....एक पेंटर की ज़िंदगी में कोई रंग नहीं होता....क्या फ़ायदा...नहीं यार ऐसी बात नहीं फ़िर भी तेरा क्या जाता है.....ठीक है.....मरियम कोई मिलने आया है आपसे कौन....जाओ....गार्डन में हैं खुद ही मिल लो....मैं यहीं रुकता हूं....अरे.....ऐहसान तुम....इतने दिनों बाद....अचानक.....कैसी हैं आप....बस जी रही हूं.....आप कैसे हैं....देख लो....जबसे आप जामिया से गये...लगता मानो सारी रौनक ही चली गई....ऐसा नहीं है...ये सब आपको लगता है.....क्या कर रहीं हैं आजकल.....जामिया मे ही पढ़ा रही हूं.....बहुत ख़ुब....कैसा है दुबई......बहुत उम्दा....कभी याद भी नहीं किया आपने....जी बस मसरुफ़ियात....मालुम हुआ बहुत मसरुफ़ रहते हैं आप.....जी नहीं ऐसी बात नहीं....ये ख़ास आपके लिए.....बहुत ख़ुबसूरत है....इसे देखकर लगता है इसे तुमने ही बनाया है.....तुम्हे कैसे मालुम....देखो ये....जब हम साथ में पेंटिंग्स बनाया करते थे तो तुम इस जगह....यो निशानात छोड़ दिया करते थे.....शादी कर ली....नहीं अभी तक नहीं...क्यों कोई मिली नहीं दुबई में नहीं बहुत मिलीं लेकिन तुम जैसी नहीं.....मजाक अच्छी कर लेते हो.....ये सच है.....मुस्कुरा भर दी मरियम....मरियम पैसा शोहरत बहुत कमा ली लेकिन सुकूं नहीं कमा पाया....तुम शायद नहीं जानती कि तनवीर की एक काल से मैं कितना खुश हुआ...भागा चला आया इससे मिलने....लेकिन तनवीर ने तो.....कोई बात नहीं मरियम गुस्से में हमें इसने जो कहा था.....वो सब मैं भुला चुका हूं आख़िर अच्छे दोस्त क़िस्मत से जो मिलते हैं.....ख़ैर छोड़ो....ये बताओ तुमने शादी क्यों नहीं की क्या तुम्हे भी कोई नहीं मिला...मैं तलाकशुदा हूं ऐहसान...ठंडी सांस भरते हुऐ...मरियम ने कहा....बिजली सी दौड़ गई......क्या हुआ....ऐहसान....मैं कुछ समझा नहीं तुम्हारे जैसी लड़की को कोई तलाक क्यों देगा भला.....मैं ये जानकर हैरां हूं कि....तुम जैसों को कितनी तकलीफ़ों का सामना करना पड़ता है.....मैं माज़ी को भूल चुकी हूं ऐहसान....मेरे ज़िंदगी अब सिर्फ़ टाइमपास है और कुछ नहीं....मेरी ज़िंदगी बेरंग हो चुकी है.....मैं नहीं चाहती की किसी और से शादी करके मैं अपना माज़ी याद करुं....मुझसे भी नहीं....नहीं तुमसे भी नहीं.....मैं अब शादी नहीं करना चाहती....हम अच्छे दोस्त हैं...और मैं चाहती हूं कि हमारी ये दोस्ता ताक़यामत क़ायम रहे.....ठीक है.....हल्की मुस्कुराहट लेकर अलविदा कह गया ऐहसान....नहीं यार मुझे शाम की फ़्लाइट से ही निकलना है....कुछ ज़रुरी काम आन पड़ा है इंशाल्लाह फ़िर आउंगा....मुझे जल्दी से एयरपोर्ट छोड़ दो.....
       


















  

Monday, April 25, 2011

मीडिया और बाज़ारवाद.....


बाज़ार से मीडिया या मीडिया से बाज़ार,ये एक ऐसा सच है जो नि:संदेह मीडिया की खोखली तस्वीर पर कटाक्ष के लिए काफ़ी है। अब जब सभी को अपनी संपति घोषित करने का फ़रमान जारी किया जा चुका है,तो भला ऐसे में पत्रकार या मीडियापर्सन को भी क्यों बख़्शा जाए। आख़िर दूसरे की फटी में जब ये लोग अपनी टांग अड़ा सकते हैं तो फ़िर उनकी भी बखिया क्यों न उधेड़ी जाए,उनके बारे में भी पता लगाया जाए कि उनके पास कितनी अघोषित संपति जमा है। लेकिन बहुत कठिन है डगर पनघट की। आज देश में कितने पत्रकार ऐसे हैं जिन्हे न तो वक्त पर तनख़्वाह मिलती है और न ही वो सुविधाऐं जिनके वो सही मायनों में हक़दार होते हैं,हालात ये हैं कि उन्हे मान्यताप्राप्त बनाने में ही सरकार सालों लगा देती है। दूसरे की आवाज़ बनने वाला पत्रकार खुद की आवाज़ नहीं उठा पाता,गली मौहल्ले के स्टिंगर से लेकर मीडिया में काम करने वालों को रोजाना कितने तनाव से गुज़रना पड़ता है,शायद आम लोगों को नहीं मालुम।हालात तो ये है कि खुद कई साल गुज़र जाने के बाद भी अगर कुछ अग्रणी पत्रकारों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर पत्रकार एक सामान्य दुकानदार से भी कम कमा पाते हैं।
     मीडिया में ग्लैमर की वजह से लोग आ तो जाते हैं लेकिन कुछ दिनों के बाद ही अपने आप को ठगा सा महसूस करते हैं,यहां की हक़ीक़त जानकर वो अपना सिर पकड़ लेते हैं। मीडिया में ज्यादातर ऐसे लोग काम कर रहे हैं जिनको पत्रकारिता कम अपना रौबदाब ज्यादा झाड़ना आता है। अगर एक सर्च करा ली जाए तो सबके कपड़े उतर जाऐंगे,टीवी पर सिक्योरिटी में बैठकर चिल्लाने वाले ज़रा सड़क पर चिल्लाकर दिखाऐं। बिना पैंदी के लौटे की तरह इस चैनल से उस चैनल इस अख़बार से उस अख़बार दौड़ते रहते हैं सारी उम्र...जो थोड़ा चालाक और तेज होता है वो बाज़ी मार लेता है लेकिन जिसका कहीं कोई लिंक नहीं वो ताउम्र कलम घिसकर और अच्छे की उम्मीद में ज़िंदगी गुज़ार देता है। ख़बर को आज नमक मिर्च लगाकर परोसा जा रहा है,ख़बर के नाम पर विज्ञापन बटोरे जा रहे हैं,पैसा लाओ चाहे पेड न्यूज़ कैसी भी हो चलाओ मत दौड़ाओ,बाज़ार में टिका रहना है तो ख़बर को माल बनाओ और अच्छी पैकिंग कर बाज़ार में उतार दो,चाहे इससे किसी का भला हो या न हो चैनल और अख़बार का भला तो है ही।
     मीडिया इंडस्ट्री का बाज़ार इस वक्त 30 हज़ार करोड़ रुपए से भी ज़्यादा का है,जिसमें कि न्यूज़ चैनल और अख़बार की हिस्सेदारी तक़रीबन 30 से लेकर 35 फीसद तक है। अब ऐसे में आप ख़ुद अनुमान लगा सकते हैं कि विज्ञापन से कितना बड़ा पैसा इसके हिस्से में आ रहा है,लेकिन टीरआरपी के चक्कर में और सबसे तेज और सबसे आगे निकलने की होड़ में ख़बरों से समझौता करना कितना आसान और फ़ायदे का सौदा है ये शायद आम लोग नहीं जानते। अब ऐसे में जो पत्रकार बाज़ार और न्यूज़ चैनल या अख़बार के दांव पेंच समझ गया वो आगे बढ़ गया,लेकिन जिसने ईमानदारी के साथ पत्रकारिता करनी चाही उसे उसकी क़ीमत का अंदाज़ा इतनी जल्दी हो जाता है जितनी कि दिन से रात।
      मीडिया में अगर सभी को अपनी संपति का खुलासा करना पड़ गया तो यहां भी अमीर-गरीब वाली खाई सामने आ जाएगी,सच्चाई तो ये है कि मीडिया में पैसा है ही नहीं, और है तो बहुत है अब ये आप निर्भर करता है कि आप किस दायरे में रहना चाहते हैं। आप अपनी ज़िंदगी अभाव में गुज़ार देना चाहते हैं या फ़िर बड़ी और लंबी गाड़ियों और नेताओं, मंत्रियों से संबधों की बदौलत बेशुमार दौलत कमाकर अपना रौबदाब बना सकते हैं। अब जब फ़रमान जारी हो चुका है तो सभी पत्रकारों को चाहे वो ट्रैनी हो या स्ट्रिंगर या फ़िर बड़ा पत्रकार सभी को अपनी संपति का खुलासा करना चाहिए फ़िर जो हकीक़त सामने आएगी उससे मुंह मोड़ना शायद हमारी सरकार और हमारे आकाओं को भारी पड़ जाएगा।

Thursday, April 21, 2011

साजिश.....


सर मैं सच कह रहा हूं इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है.....ये सब साजिश है मेरे खिलाफ़....मैं तो सिर्फ़ बीचबचाव करने में लगा था.....झूठ बोलते हो तुम सफेद झूठ...गुस्से में चिल्ला पड़ा एडीटर....जानते हो डायरेक्टर ने तीन दिन की मोहलत दी है मुझे.....मामला क्लियर करने की....शर्म आनी चाहिए तुम्हे....ऐसा काम करते हुए....क्या ये सच नहीं है कि…. तुम....एकता और रिजवान तीनों हाई-फाई चैनल में काम करते थे....क्या ये सच नहीं है कि तुम ही एकता के बारे में रिजवान को ख़बर दिया करते थे....क्या ये सच नहीं है कि तुमने ही रिजवान को यहां बुलवाया.....कम-से-कम झूठ तो मत बोलो .महेंद्र....सर मैं....मैं कुछ नहीं सुनना चाहता तुम्हारी वजह से चैनल को कितनी बदनामी उठानी पड़ी इसका इल्म है तुम्हे.....आख़िर तुम चाहते क्या थे इस चैनल की बदनामी या फिर कुछ और.....सर मैं.....देखो मैनेजमेंट का सख़्त आर्डर है कि तुमको चैनल के आसपास फटकने भी न दिया जाऐ.....तुम मेरे ख़ास आदमी थे इसलिए मैं अब तुमसे दूरियां अख़्तियार कर लूं इसमें ही मेरी भलाई है....आखिर मैं बुढ़ापे में कहां नौकरी तलाश करुंगा....गेट आउट फ्राम हियर....
      जी सर निकाल बाहर किया है मैने महेंद्र को साला इतना हरामी है कि झूठ पे झूठ बोले जा रहा था....जी सर बिल्कुल सर....हो जाएगा सर....आप टेंशन न लें सर मैं हूं न....डायरेक्टर के सामने मिमिया रहा था एडीटर....आओ वर्मा....बैठो....यार इस हरामी महेंद्र ने चैनल की एक झटके में बदनामी करवा दी.....साला दूसरे की फटी में क्यों टांग अड़ा रहा था मुझे समझ नहीं आ रहा है.....यार मैं समझ नहीं पा रहा आख़िर मामला है क्या.....इस बारे में सर एक ही आदमी बता सकता है और वो है.....रितेश....आफ़ताब का जिगरी दोस्त....अपनी कुर्सी बचाने के लिए सच उगल देगा वो.....बुलवाइये उसे.....
      देखो सब सच-सच बता दो तुम पर भी तलवार लटक रही है....लेकिन मैं तुम्हे बचा लूंगा.....प्रामिस....सर किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि मैने आपको सच बताया....यार विश्वास करो....बिलीव मी....टेंशन मत लो.....और फिर तोते की तरह बोलने लगा रितेश......सर महेंद्र रिजवान और एकता तीनों हाई-फाई चैनल में काम करते थे....महैंद्र वहां जोब पर था और रिजवान ट्रेनी....और एकता…. जी वो इंटर्न थी.....वो सर रिजवान को चाहती थी.....दोनों का चक्कर चलने लगा........जी सर फ़िर....महेंद्र यहां आ गया.....और रिजवान ओके चैनल में चला गया....एकता और रिजवान आपस में खुब मिला करते थे...लेकिन एक दिन एकता की बहन ने उसे बाइक पर घर छोड़ते देख लिया और उसकी काफी पिटाई कर डाली....साथ ही उसके घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी.....कुछ दिनों बाद फोन पर रिजवान ने उसे किसी भी चैनल में ज्वाइन करने को कहा जिससे कि वो आपसे में खुलकर मिल सकें .....अपनी बहन से कसमें खाकर एकता ने महैंद्र से कान्टेक्ट किया और फिर महैंद्र ने उसे यहां लगवा दिया....फिर...फिर सर....एकता का हमारे यहां के एक इंटर्न आफ़ताब से चक्कर चलने लगा....दोनों साथ-साथ आने-जाने लगे....महेंद्र को ये बात नागवार गुज़री.....क्योंकि महैंद्र आफ़ताब से जलता था....और उसने रिजवान को सारी हकीकत बयां कर दी....फोन पर रिजवान को गुस्से में एकता ने काफी बुरा भला कह दिया....फिर....
       रिजवान ने एकता को समझाने की काफ़ी कोशिश की लेकिन वो नहीं मानी........अब महैंद्र और रिजवान ने आफ़ताब को सबक सिखाने का प्लान बनाया....और आफ़ताब को पीटने के लिए तैयारी शुरु कर दी....और वो इस चैनल मैं आ गया....महैंद्र ने उसे बाइज्जत गेस्ट रुम में बिठवा दिया....और फिर....आफ़ताब को किसी से मिलवाने का बहाना करके उसे चैनल से बाहर ले गया....वहां थोड़ी देर रुकने के बाद वो वापस अंदर आया और रिजवान को बाहर भेज दिया....आफ़ताब का सारा हुलिया भी बता दिया....और खुद चैनल के अंदर ही रुक गया.....रिजवान ने बाहर आते ही आफ़ताब से बहस करनी शुरु कर दी....जिस पर आफ़ताब ने उसे थप्पड़ मार दिया....गुस्से में आगबबूला होकर रिजवान वहां से चला गया....फिर क्या हुआ....
      फिर आफ़ताब ने ये सब मुझे बताया....मैं लंच के बहाने चैनल के आसपास घूम आया लेकिन रिजवान कहीं नज़र नहीं आया....कुछ देर बाद हमने सोचा कि मामला ठंडा पड़ गया है....लेकिन सड़क पर थोड़ी दूर हम जैसे ही चले रिजवान और उसके दोस्तों ने आफ़ताब पर हमला कर दिया...मैने आफ़ताब को चैनल की तरफ़ भागने को कहा...क्योंकि वहीं उसकी जान बच सकती थी....इसके बाद हम रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पंहुचे....पीछे से महैंद्र एकता और रिजवान को लेकर वहां पंहुच गए और दरोगा पर रिपोर्ट दर्ज कराने का दवाब डालने लगे....जिस पर आफ़ताब और रिजवान को लाकअप में बंद कर दिया गया.....थाने में एकता और रिजवान पुरानी बातों को लेकर कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे थे....तब मुझे और आफ़ताब को सारा माज़रा समझ में आ गया.....सर एक बात कहूं ये सब कमीने महैंद्र का ही किया धरा है.....किसी को भी चैन से नहीं बैठने देता था वो.....खुद अपने खोदे गढ्ढे में जा गिरा.....ठीक है तुम जाओ.....ओके...सर....समझे वर्मा सारा मामला ये है....यानि मुझसे झूठ बोल रहा था कि मैं रिजवान को नहीं जानता...जी सर.....हो गया है सर क्लियर हो गया है.....तीनों को निकाल दिया गया है सर.....पूरी बात भी पता चल गई है.....ये सब महैंद्र का किया धरा था....नहीं सर चैनल की रैपो पर कोई आंच नहीं आएगी....आप टेंशन न लें सर....