Saturday, July 9, 2011

एहसास...


अजीब कशमकश में हूं साहब
बड़ी उलझन मैं जी रहा हूं मैं
चार टुकड़े हो गए हैं बेक़सूर जिस्म के
एक दिल,एक वो,एक हम, एक तुम
क्या हुआ एहसास को मर गया है शायद
फ़िर मुकद्दर ले के आया उसी मंज़र पर
खो गई हैं बिजलियां सी वो कहीं गुमशुदा
ढुढंना मुमकिन नहीं है कैसे ढूंढे हम उन्हे
एक शाम,एक रात,एक सुबह,एक शब
क्या हुआ एहसास को मर गया है शायद
अजीब कशमकश में हूं साहब
बड़ी उलझन मैं जी रहा हूं मैं

Friday, July 8, 2011

तस्वीर...


मेरे क़रीब से वो बिछड़ा कुछ इस तरह
पानी से जैसे दाग़ धुलता हो जिस तरह
कितनी मसर्रत थी मुझे उसके क़रीब से
वो आंधियों में मिलता था फानुस की तरह
मेरी तो ज़िदगी है एक खुली किताब सी
उसकी भी ज़िदगी में खुला अहसास था
वो वादियों में मिलके तबस्सुम सा लापता
मैं हैरां था कि दिल में कोई रंज़ो-ग़म न था
ऐ काश कोई उन तक मेरा ये पैग़ाम दे
जो हो सके तो लौटके ये पयाम दे
ग़र हो क़याम चार दिन इस ज़िदगी में भी
तस्वीर बदल जाऐगी इस मयक़दे की भी



Saturday, July 2, 2011

तस्वीर...


कुछ दिनों क़ब्ल ही मेरा अफ़रोज़ से तलाक हुआ था...वो ज़िंदगी को अपने ढंग से जीना चाहती थी और मैं अपने ढंग से...हालांकि कालेज की दोस्ती कब प्यार में तब्दील हो गई थी ये मुझे मालूम ही नहीं चला था...अफ़रोज़ की खूबसूरती पूरे कालेज में मशहूर थी...मैं उन दिनों रिसर्च के सिलसिले में कालेज में नया-नया आया था...उन्ही दिनों कैंटीन में कॉमन फ्रेंड के ज़रिए मेरी उससे मुलाकात हुई...उसकी आंखों में कुछ अलग सी कशिश थी जो मुझे उसकी और खींच ले गई...रिसर्च पूरी होने के बाद मैने नौकरी ज्वाइन कर ली...अब वक्त था कि मैं अफ़रोज़ से शादी के बारे में खुलकर बात कर सकूं...मैं उस वक्त हैरान रह गया जब मैंने कॉफी केफै़ हाउस में उसे शादी के लिए प्रपोज़ किया और वो फौरन मान गई...उसके वालिद ने भी फौरन हमारी शादी के लिए रज़ामंदी दे दी...पर अफ़सोस हमारी ये शादी ज़्यादा दिनों तक नहीं चल सकी....इसकी क्या वुजूहात रहीं मैं खुद आज तक नहीं समझ पाया...जो लड़की मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकती थी वो मुझसे इतनी ख़फ़ा हो गई मैं खुद भी समझ नहीं पाया....छोटी-छोटी बातों को लेकर वो अक्सर झगड़ती,छोटी सी बात का तिल का ताड़ बना देती...मुझ पर शक करती...रात को देर से आने पर मुझसे हजारों सवालात करती मैं उसकी इन बातों से आजिज़ आ चुका था....बेहतर तो ये था कि मैं कुछ रोज़ के लिए उसे अकेला छोड़ देता ताकि मैं उसे समझने का मौका दे देता....आख़िर ऐसा करके भी कोई नताइज़ हासिल नहीं हुआ...वो और ज़्यादा आग-बबूला हो गई...मैं अम्मी के पास कुछ दिन की छुट्टी लेकर क्या गया उसने हंगामा बरपा कर दिया....मेरी अम्मी खुद इस बात से परेशान हो गई...हद तो ये हो गई कि वो बिना बताए वहीं आ गई और अम्मी पर फ़िकरे कसने शुरु कर दिए....इसी गुस्से में मैने एक जोर का तमाचा उसके मुंह पर जड़ दिया...आखिर एक हद होती है...वो फौरन वहां से पांव पटकती हुई चली गई...अम्मी ने काफ़ी समझाने की कोशिश की पर उसके सर पर तो जैसे भूत सवार था...उसने किसी की नहीं सुनी...
      मेरे घर में कदम रखते ही वो मुझ पर बरस पड़ी...मैं ठान चुका था कि अब पानी सर से उपर हो चुका है....उसने मुझसे तलाक का मुतालबा किया...मेरे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गई....मैं पूरी रात सो नहीं पाया....आख़िर माज़रा क्या है मैं समझ नहीं सका...वो क्यों मुझसे इतनी बेरुख़ी से पेश आती थी..मैं जान नहीं पाया...दोनों की ज़िंदगी में अब कुछ भी बाकी नहीं रह गया था...तलाक लेना ही मुनासिब था...अदालत ने हमारी तलाक पर अपनी मुहर लगा दी....दोनों ने अपना अपना रास्ता अख़्तियार कर लिया...कुछ दिन अम्मी मेरे साथ रही तो अकेले रहने का अहसास नही रहा मग़र अम्मी के जाते ही घर काटने को दौड़ता...नौकरी कर के किसी तरह पूरा दिन को कट जाता मगर रात का क्या करुं....कैसे कटेगी...यही सोचकर दिल घबरा उठता था...
       अचानक मेरा तबादला हो गया....थोड़ी राहत मिली...नई जगह नए लोग...अफ़रोज़ को भूलना इतना आसान नहीं था...रह-रहकर मुझे उसकी बातें याद आती थीं...मैं खुश था कि नए शहर मैं नई ज़िदगी को अपने ढंग से जी सकुंगा...हर इतवार अपनी आपा के पास चला जाता उसके बच्चों के साथ मेरा दिल बहल जाता था....आपा मेरे लिए गुपचुप तरीके से लड़की की खोजबीन कर रही थी...इसका इल्म हो गया था मुझे....आपा देखो अब में शादी नहीं करुंगा...क्यों नहीं करोगे क्या सारी उम्र ऐसे ही....हां आपा...ऐसे ही....क्या सिला मिला मुझे शादी करके...एक पल भी अफ़रोज़ ने नहीं सोचा कि तलाक के बाद मुझ पर क्या गुज़रेगी...देखो...नहीं आपा...मैने कह दिया न...कहकर मैं अपने घर चला आया....
     ये आपके अंडर में काम करेंगी....इनकी पूरी रिपोर्ट हर महीने पेश करेंगे आप...और यकीनन बेहतर काम निकलवा सकेंगें इनसे...जी बेहतर...बैठिए...क्या नाम है तुम्हारा...जी सायमा...देखो अपने काम पर ज़्यादा ध्यान देना...मुझे कोई भी शिकायत नहीं मिलनी चाहिए...ठीक है...जी...जाओ अब काम करो...
     सर..आप मुझे ऐसे क्यों घूर रहे हो...क्या मतलब....सर मैं....बदतमीज़...तुम्हे घूर कर क्या करुंगा मैं...चली जाओ अपने केबिन में...आइंदा इस तरीके की बात की तो खैर नहीं...अरे मैने अचानक तुम्हे देख लिया तो क्या हर्ज़ है...इसे तुम घूरना कहती हो....सारी सर...सारी की बच्ची...न जाने क्यों...सायमा ने मुझे अफ़रोज़ की याद दिला दी...एक बार उसने भी कैंटीन में मुझसे कहा था....तुम मुझे घूर क्यों रहे हो....क्या मेरी नज़र ही ऐसी है...शाम को आइने में गौर से अपना चेहरा और अपनी आंखें देख रहा था मैं....घंटों आइने के आगे खड़ा रहा...फोन की घंटी बजने पर ही मेरी नज़र आईने से हटी....ये क्या हो रहा है मुझे...कहीं मैं...नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता...डाक्टर साहब मेरी आंखे चेक करें...लोग मुझे अक्सर कहते हैं कि मैं उन्हे घूरता हूं....ये आपका वहम है...और कुछ नहीं...जब भी कोई आपसे मज़ाक मैं कुछ कहता है तो आप उसे संजीदा तौर से ले लेते हैं....ऐसा न करें...जी..शुक्रिया....
      सर आप फिर से मुझे घुर रहे हैं....मैं हैरान था...मैं तुम्हे क्यों घूरुंगा भला...मुझे तुममे कोई दिलचस्पी है ही नहीं...सर मैं तो मज़ाक कर रही थी...आपसे कल भी मज़ाक किया तो आप बुरा मान गए....नहीं ऐसी कोई बात नहीं....और फ़िर एक दिन...अरे सायमा कहां है....सर पता नहीं...कहां रहती है वो...मालुम नहीं...कहां...पगली तुम्हे इतनी तेज़ बुख़ार है और तुमने बताया तक नहीं...आपा कुछ दिनों के लिए सायमा यहीं रहेगी जब तक इसकी तबियत ठीक नहीं हो जाती....लेकिन इसके खानदानवालों को तो फोन कर दो....आपा वो सहारनपुर में रहते हैं...एक-दो दिन लगेगें आने में...ठीक है....मैं आफ़िस निकलता हूं शाम को आउंगा....कैसी है अब सायमा थोड़ी बेहतर है पहले से सर....
       और फ़िर शाम को...कैसे बिमार हुईं तुम....आपा ने पूछा...इनके घुरने से...मुझे आग लग गई....कहीं ये पागल तो नहीं....तू तो कह रहा था कि अब मुझे लड़कियों में कोई दिलचस्पी नहीं है...तो फ़िर ये क्या है...आपा पागल है ये...जब देखो यही सवाल करती रहती है....और फ़िर बाद में माफ़ी भी मांग लेती है....मुझे नहीं मालुम इसे ये बिमारी कब से है...चलो खैर खाना खा लो....एक भी निवाला मेरे मुंह में नहीं जा रहा था...गुस्से के मारे...अजीब पागल लड़की है..कहीं भी कुछ भी बोल देती है....तभी उसके अहलेखाना भी आ पंहुचे....आपने हमारी बेटी का ख़्याल रखा इसका आपका बहुत-बहुत शुक्रिया....हम लफ़्ज़ों में बयां नहीं कर सकते कि इस अंजान शहर मैं भी कोई किसी का हो सकता है....
       आइंदा अगर तुमने घूरने वाली बात किसी के सामने कही तो समझ लेना..अरे मैं तुम्हे क्यों घुरूंगा भला...तुम शायद नहीं जानती कि मेरा तलाक हो चुका...कितना दर्द सहा है मैने अपनी गुजिश्ता ज़िदगी में...अपनी सारी हक़ीकत शुरु से आख़िर तक उसके सामने बयां कर डाली मैने...कब वक्त बीत गया पता ही न चला...सर मुझे माफ़ कर दो....मैंने आपका दिल दुखाया है....आप इतने नेक इंसान हैं ये मुझे उस दिन मालुम हो गया था जब आप डाक्टर को लेकर मेरे घर आऐ थे....आप का मेरा तो कोई रिश्ता भी नहीं है....और आप और मैं तो ज़्यादा घुले-मिले भी नहीं फ़िर भी आपने बिना ये सब जाने मेरी सेहत का कितना ख़्याल रखा मैं ताउम्र नहीं भूल सकुंगी ये सब....
      आप कल ही ज्वाइन कर लें तो बेहतर होगा....जी सर मैं रात को ही देहली निकल जाउंगा रात को नहीं शाम तक निकल जाओ...ठीक है...सर...ठीक है आपा अपना ख़्याल रखना....आता-जाता रहूंगा....कैसी नौकरी है तुम्हारी हर छह महीने में तबादला हो जाता है....और सायमा का क्या....क्या मतलब सायमा का क्या...अरे मुझे उससे क्या लेना...वो अपनी ज़िदगी में खुश है...और मैं खुश रहने की कोशिश कर रहा हूं....अब फिर से तुम्हे देहली मैं अफ़रोज़ की याद नहीं आऐगी...आपा वो मेरा माज़ी बन गई है....मुझे अपना मुस्तक़बिल देखना है...चलता हूं....एक मिनट ठहरो...वो देखो तुम्हारा मुस्तक़बिल सामने खड़ा है....अचानक नज़र गई तो सामने सायमा खड़ी थी...आपा पागल हो क्या मुझे ये मज़ाक पसंद नहीं....जाते-जाते मेरा मूड ऑफ मत करो....मेरे इतना कहते ही सायमा मुझसे लिपट गई....मुझे छोड़कर मत जाइऐ सर....मैं आपसे बिना मर जाउंगी...जी नहीं पाउंगी आपके बगैर...आप जैसा भी कहेंगें मैं वैसा ही करुंगी...अरे छोड़ो मुझे ये क्या पागलपन है...मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता...क्यों...आख़िर क्या कमी है मुझमें..कोई कमी नहीं है पर अब मैं अपनी ज़िदगी अकेले ही जीना चाहता हूं....अकेले...अकेले ज़िदगी जी लोगे तुम...अभी तो जवान हो....बुढ़ापे का क्या...और कब एक पंख से पक्षी उड़ा है आसमान में...कब तक आख़िर कब तक.... किसी एक के जाने से ज़िदगी तो नहीं रुक जाती.... सायमा के चेहरे पर नज़र जाते ही मेरा गुस्सा काफ़ूर हो गया....मैं कितना ग़लत था आपा...कमी मुझमें भी तो होगी जो अफ़रोज़ ने मुझे छोड़ा पर शायद सायमा तुम्हे ताउम्र न छोड़ पाऐ...आपा ने ठंडी आह भरते हुए कहा...क्योंकि इसकी आंखों में सच्ची मुहब्बत नज़र आयी है मुझे....अब जाओ और जल्द ही वापस आना....तुम्हे एक से दो करना है....जी ज़रुर....मैं मुसकुराकर एयरपोर्ट के लिए निकल पड़ा....
            

Thursday, June 30, 2011

अक्स.....


1..वो अक्सर यूं अंधेरे में चुपचाप जीते हैं,
के गोया मर्ज़ हो उनको निस्बते-मुहब्बत का....
वो आधी रात को उठके यूं रोते हैं अकेले में,
के गोया दर्द हो उनको ज़माने से उम्रभर का...

2..ये इश्क न होता जो कभी यार न होता....
न प्यार ही होता न ऐतबार ही होता....
उसे न आंसूओं की समझ न रंज किसी का..
मुद्दत गुज़ार लेने से कोई अपना नहीं होता...


3..ज़िंदगी के कुछ लम्हे यूं ही गुज़र गए,
फ़िर से तेरी याद में आंसू निकल गए....
तन्हाईयों को वफ़ा की उम्मीद थी मग़र,
जो ज़ख्म थे हरे वो फ़िर से भर गए


4..ज़रा सोच लिजिए एक बार फ़िर से,
क्यों हो इतने परेशां तुम अपने दिल से....
वो तो ख़ुशबू है उसे हवा में घुलना था...
.क्यों तुम बेदार हो अपने घर से......
उसको अब तक मयस्सर नहीं तेरा साया...
वो तो जी लेता है तेरी याद को याद करके....


5..गुजिश्ता कुछ दिनों से वो नहीं सो पाऐ सारी रात,
उन्हे महसूस होता यूं के कोई आया है उसके पास...
उसकी आंखों में जो तस्वीर कुछ धुंधली सी दिखती है....
यही वजह है कि है वो उसकी परेशानी का बाइस है.....


6..दिल से जो जुड़ा उस दिन वो शख़्स है कहां,
नज़रे जो चुरा रहा है वो अक्स है कहां.....
ये सारी उल्फ़तें तो मुकद्दर की बात है,
अंजाना ही सही पर वो खोया है अब कहां....
तस्वीरों में तो शायद मिल जाऐगा कहीं,
पर मेरे अल्फ़ाजों में आवाज़ है कहां.....


7..तुम क्या जानो इस दिल में हैं दर्द छिपे कितने,
तन्हाई में आख़िर देखो मर्ज़ छिपे कितने.....
अंधियारों में जीते हो तुम आफ़ताब की बातें करते हो,
सच्चाई तो ये है कि तुम ख़ुद से बेहद डरते हो......

Monday, June 27, 2011

बदलता दौर और अख़बारी क्लैवर.....


इलैक्ट्रोनिक मीडिया के विस्तार,जल्दी ख़बरें पेश करने और दृश्यों की प्रधानता ने अख़बारों को सोचने पर मजबूर कर दिया। न्यूज़ चैनलों के मार्केट में आने से न सिर्फ़ अख़बार के पाठकों की संख्या में कमी आई बल्कि पाठकों ने उन अख़बारों को तरजीह देना शुरु कर दिया जो अपने आप में संपूर्णता परोसते हैं।उन्हे ख़बरों में भी मनोरंजन नज़र आने लगा। ऐसे में अख़बारों के सामने नई चुनौती पेश आ गई,कुछ बड़े ब्रांड ने हाथोंहाथ अपने कंटेंट में परिवर्तन कर लिया और कुछ ने मार्केट में रिसर्च कर ये पता लगाने की कोशिश की कि आख़िर सुधी पाठक इस कंपटिशन के दौर में कैसी ख़बरें पढ़ना पसंद करते हैं।ज्यादातर अख़बारों ने न सिर्फ़ अपना क्लैवर बदला बल्कि अपनी ख़बर को पेश करने का अंदाज़ भी बदल डाला,आख़िर मार्केट में जो टिके रहना था। कुछ अख़बारों ने अपनी भाषा में आम बोलचाल यानि हिंग्लिश को तरजीह दी तो किसी ने अपनी भाषा को हिंदी के साथ-साथ दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने से भी गुरेज़ नहीं किया।
      न्यूज़ चैनल के तेज़ ख़बर पेश करने के दबाव में अख़बार ने भी ख़बरों में तेजी लाना शुरु कर दिया,व्यूज़ की जगह न्यूज़ को ज़्यादा तरजीह दी गई ताकि लोगों को अख़बार किसी भी सूरत में बासी न लगे। हालांकि आज भी हिंदुस्तान में आम लोगों के पास न्यूज़ पंहुचाने का सबसे सस्ता और सरल माध्यम अख़बार ही हैं। दो से चार रुपए की क़ीमत में आपको न सिर्फ़ देश-दुनिया की ख़बरें बल्कि साहित्य और कैरियर से जुड़ी जानकारियां भी प्राप्त होने लगीं,ये सब न्यूज़ चैनलों से हो रही प्रतिस्पर्धा के कारण ही संभव हुआ।
      एक वक्त था जब प्रिंट को विश्वसनिय माना जाता था क्योंकि प्रिंट ख़बरों का विश्लेषण करता था कोई भी ख़बर हो अख़बार उसे छापने से पहले उसकी पूरी जांच-परख़ करता था परंतु आज के दौर में ये संभव ही नहीं है,अब न तो अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों में ख़बरों की समीक्षा की क्षमता है औऱ न ही वो ख़बरों को सामाजिक पहलू में आंकते हैं उनके लिए ख़बर एक मात्र वस्तु बन गई है।जिसे वो बढ़िया पैकिंग में लपेटकर अपने पाठकों को परोस देते हैं बिना ये जाने कि इसका उनकी मानसिकता पर कोई असर पड़ने वाला है। आज अख़बारों से शब्दों की दोस्ती भी तकरीबन ख़त्म सी हो गई है,एक दौर था जब अख़बारों में ठेठ हिंदुस्तानी शब्द और मुहावरे पेश किए जाते थे ऐसे शब्द जो न सिर्फ़ अनपढ़ बल्कि सूदूर गांव में चौपाल पर चारपाई लगाऐ अख़बार पढ़ते हमारे बुजुर्गों की समझ में ख़बर पढ़ते हा आ जाते थे। मगर आज की भागमभाग वाली जीवनशैली में हम एक से दो मिनट में अख़बार पढ़ डालते हैं। क्योंकि अख़बार में ऐसा कुछ होता ही नहीं है जिस पर हमारी नज़र टिक सके।
      आज किसी भी अख़बार का ध्यान से विश्लेषण किजिए आपको सच्चाई नज़र आ जाऐगी,कोई भी अख़बार ऐसा नहीं है जो अपने पाठकों के हितों का ख़्याल रखता हो,उस पर अख़बार के मालिकों का तुर्रा ये कि मार्केट में टिके रहने के लिए अख़बार को ब्रांड बनाकर पेस नहीं करेंगे तो मार्केट में टिके रहने मुश्किल है, अख़बार बंद हो गया तो,बिल्कुल सही बात है मार्केट का तो आपको ख़्याल है मगर उस पाठक का आपको ज़रा भी ख़्याल नहीं जो सच्ची और मनोरंजक ख़बरों के लिए आप पर निर्भर है।आप उसे सुबह-सुबह चाय के प्याले के साथ पहले पन्ने पर क्या पेश कर रहे हैं,अपराध और रेप से जुड़ी ख़बरें या फ़िर लूट खसौट वाली ख़बरें जिससे कि उसका मन पहले ही खिन्न हो चुका है।
     न्यूज़ चैनलों की देखादेखी अख़बारों ने भी अपनी ख़बरों के क्लैवर में बदलाव कर दिया,अख़बारों को रंगीन बना दिया गया उसके पहले पन्ने को अपनी साख दिखाने के लिए विज्ञापन से पाट दिया गया ताकि लोगों को लगने लगे कि मार्केट में इस अख़बार की काफ़ी अच्छी रेपो है और ये जो ख़बरें पेश करता है वो विश्वसनिय हैं।सिर्फ़ विज्ञापन के दम पर अपने पाठकों को बेवकूफ़ बनाना कहां कि समझदारी है।      

Sunday, June 12, 2011

ख़बरों को तमाशा बनाने का खेल...


पिछले दिनों दो तीन ऐसी घटनाऐं एक के बाद एक घटी कि मेरा दिल कुछ तल्ख़ लिखने को मजबूर हो गया।एक और जहां बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को बर्बरतापूर्वक दिल्ली के रामलीला मैदान से खदेड़ दिया गया तो दूसरी और कांग्रेस के प्रवक्ता जनार्दन द्धिवेदी को एक पत्रकार ने जूता दिखा दिया तो वहीं मुंबई में सरेआम एक पत्रकार को गोलियों से भून दिया गया। इन तीन घटनाओं ने मुझे मेरे पेशे के प्रति संजीदगी से सोचने को मजबूर कर दिया,मुझे पहली बार लगा कि पत्रकार चाहे कितना भी प्रोफेशनल हो एक न एक बार तो अपने पेशे के प्रति वफ़ादार होता ही है।सबसे पहले बाबा रामदेव की ख़बर पर आते हैं,बाबा रामदेव ने देश का 4सौ करोड़ रुपए का काला धन का मामला उठाकर जैसे गुनाह कर डाला। सरकार बाबा रामदेव के पीछे हाथ धो कर पड़ गई,उनकी संपति से लेकर उनके इतिहास तक के बारे में पता लगाने की कोशिश करने लगी।इससे नाराज़ बाबा ने दिल्ली की बजाए हरिद्धार से ही अपना अनशन शुरु कर दिया,गर्मी के मौसम में बाबा की तबियत ख़राब हो गई और बाबा को जबरन देहरादून के हिमालयन अस्पताल में भर्ती कराया गया। साधु-संतों की काफ़ी मान-मुनोव्वल के बाद बाबा ने अपना अनशन तोड़ा।लेकिन जिस तरीके से मीडिया ने बाबा की ख़बरों को दिखाया और छापा उसने पत्रकारिता के पेशे पर सवालिया निशान लगा दिए,जिस बाबा को मीडिया ने इतना हाइप कर दिया था उसी बाबा को टीआरपी के फेर में मीडिया ने इतना नीचे गिरा दिया कि खुद बाबा को भी अहसास नहीं हुआ।ज़्यादातर टीवी चैनल बाबा को स्त्रीवेश में मैदान से बाहर निकल जाने को ऐसे दिखा रहे थे जैसे कि बाबा ने कोई संगीन जुर्म किया हो,इससे उन लोगों में जो बाबा को सम्मान की नज़र से देखते थे उन्हे धक्का लगा। उन्हे लगा कि ये बाबा भी दूसरे बाबाओं की तरह से ढोंगी है। जो पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए स्त्रीवेशभूषा में मैदान छोड़कर भाग निकला। रात के दो बजे अगर पुलिसवाले अपनी नौकरी की ख़ातिर बाबा के हाथ-पैर तोड़ देते तो क्या होता। क्या मीडिया की ज़िम्मेदारी नहीं बनती थी कि वो इस तरह की ख़बरों को दिखाने से परहेज करता मीडिया को किसी की भी छवि पर धब्बा लगाने की कोशिश करने का हक़ किसने दिया।क्यों मीडिया ने रामलीला मैदान पर अपने अपने द बेस्ट रिपोर्टरों को लगाया, जाने देते...अगर मीडिया इतना हाइप न करता तो बाबा को गरियाने वाले नेता उनके कदमों में बैठे होते। लेकिन मीडिया ने उनकी इज्जत को तार-तार करने में कोई कसर न छोड़ी,टीवी पर चीख-चीख कर बताया जा रहा था कि देखिए ऐसे भागे बाबा हम दिखा रहे हैं सबसे पहले आपको एक्सक्लूजिव लेकिन ये पब्लिक है सब जानती है, मीडिया का नंगा सच सबके सामने है। बाबा को आज भी उतनी इज्जत हासिल है जितनी कि पहले थी,आख़िर संविधान ने आवाज़ उठाने का हक़ सबको दिया है और मीडिया जतनी जल्दी समझ जाऐ उसकी सेहत के लिए अच्छा है।
      इसी बीच दूसरी ख़बर आई कि कांग्रेस के प्रवक्ता जनार्द्धन द्धिवेदी की प्रेस कांफ्रेस में एक नामालुम पत्रकार ने उन्हे जूता दिखा दिया,जिस पर उसकी जमकर पिटाई कर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया,अगले दिन टीवी चैनलों ने दिखाया कि कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी उस पत्रकार को लात मारी,बस क्या था टीवी चैनलों को टीआरपी बढ़ाने का फार्मूला मिल गया,कोई ऐनिमेशन से लोगों को समझा रहा था तो कोई अपने सहयोगी के कंधे पर हाथ रख उचक-उचक कर बता रहा था कि ऐसे लात मारी दिग्विजय सिंह ने। आख़िर ये सब है क्या.. इसमें कोई सच्चाई नज़र नहीं आई इससे बेहतर तो ये था कि उस पत्रकार से पूछा जाता कि आख़िर उसने ये क़दम क्यों उठाया। लेकिन इससे उलट मीडिया ने ख़बर को चटपटा बनाने के लिए मसालों का भरपूर प्रयोग किया।
      बाबा रामदेव के अनशन के बीच एक दिल दहला देने वाली ख़बर आई कि मुंबई में मिड डे से जुड़े क्राइम पत्रकार और अंडरवर्ल्ड पर दो बेहतरीन किताबें लिखने वाले ज्योतिर्मय डे को कुछ लोगों ने गोलियों से भून डाला। हैरानी की बात ये है कि अपने साथी की मौत पर किसी को कोई रंज नहीं किसी भी टीवी चैनल ने इस पत्रकार की मौत पर आधे घंटे का प्रोग्राम नहीं बनाया,जबकि वो पत्रकार ख़बर जुटाने की बजाए खुद ख़बर बन गया। ऐसा क्यों है अगर राखी सावंत को कोई सिरफ़िरा छेड़ दे तो आधे घंटे का प्रोग्राम हर टीवी चैनल पर तय मानिए, मगर अगर कोई पत्रकार पिटता है या मारा जाता तो उसके लिए इनके दिलों तो छोड़िए इनके टीवी चैनलों के प्राइम टाइम में कोई जगह नहीं है। किसी भी टीवी चैनल नें ज्योतिर्मय के परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया सरकार पर तो दबाव डालना दूर की बात है। इससे एक बात साफ़ हो जाती है कि पत्रकारिता में खुदगर्जी कितनी हावी हो चुकी है,कहा जाए तो संवेदना मर चुकी है इन्हे चाहिए तो बस टीआरपी,और इसके चक्कर में ये खुद कब तमाशा बन जाऐं इन्हे इसकी परवाह नहीं।   
       

Friday, June 10, 2011

कल करे सो आज कर....


जल,जंगल और ज़मीन इन तीन चीज़ों से मिलकर बनी है ये दुनिया। मगर आज ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में कहीं न कहीं इस दुनिया के अस्तित्व पर ही ख़तरा मंडरा रहा है,आधुनिकता की अंधी दौड़ में हर इंसान भागा जा रहा है। आज इंसान अपने फ़ायदे के लिए प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रहा है। पूरी दुनिया में हर वक्त न जाने कितने भूकंप,सूनामी,बाढ़ और विपदाऐं आती रहती हैं मगर मनुष्य लालच के फेर में इन सब चीज़ों से मुंह फेर लेता है,भले ही उसे इसका परिणाम भुगतना पड़ जाऐ उसे इसका ग़म नहीं। पिछले दिनों जापान में आई भयानक सूनामी से लाखों लोग मारे गऐ और करोड़ों रुपए की संपति का नुकसान हुआ,लेकिन फ़िर भी मनुष्य प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से बाज़ नहीं आ रहा है। आज दुनिया के ज्यादातर इलाकों में घने जंगल मिटते जा रहे हैं इनकी जगह कंक्रीट के जंगलों ने ले ली है,इन जंगलों में आलिशान बंगले,इमारत और माल्स बनाए जा रहे हैं। जंगलों में रहने वाले जानवरों की तादात में भी कमी आ गई है क्योंकि जंगलों के सिकुड़ने की वजह से जानवरों का जीवन संकटग्रस्त हो गया है,फलस्वरुप ज्यादातर जानवर सिर्फ़ किताबों में ही नज़र आने लगे हैं।
       ऐसा नहीं है कि मनुष्य इसके बारे में न जानता हो,हर साल पर्यावरण के नाम पर विश्व की कई सरकारें पर्यावरण और ग्लोबलाइजेशन को लेकर आपस में गहन चर्चा करती हैं,मगर कोई भी ठोस निर्णय नहीं ले पाती हैं। आज धीरे-धीरे पानी की कमी हो रही है इसकी वजह से हिंदुस्तान जैसे विकासशील देश में कई ईलाकों में पानी तक मयस्सर नहीं हो पा रहा है,जिससे न सिर्फ़ वहां रहने वाली आबादी बल्कि जंगली जानवर को पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है। कई ईलाकों में नदियां, नाले, पोखर लगभग सूख चुके हैं और उनके फ़िर से भरने की उम्मीद बेहद कम नज़र आ रही है। पर्यावरण संकट की वजह से पूरी दुनिया में वायु भी प्रदुषित हो चुकी है नाईट्रोजन और कई दूसरी विषैली गैसों के वायुमंडल में घुल जाने से कई प्रकार की बिमारियां फैल रहीं हैं जिनमें कैंसर जैसी बिमारियां प्रमुख हैं।लाखों लोग हर साल इन बिमारियों की चपेट में आकर मौत के मुंह में चले जाते हैं।लेकिन कभी भी प्रकृति पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ़ एकजुट नहीं हो पाते हैं,आज हालात ये है कि न तो लोग बाढ़ से अपनी रक्षा कर पाते हैं और न ही सूनामी जैसी आपदा को रोक पाते हैं।
        प्रकृति जब नाराज़ होती है तो उसके आगे किसी का बस नहीं चलता वो फ़िर अपने रास्ते में आई हर रुकावट को दूर करती चली जाती है। उसके कोपभाजन का शिकार बनने के बाद जब हम आंखें खोलकर देखते हैं तो खुद को ठगा सा महसूस करते हैं। कैसे एटम बम,कैसे चांद सितारे,कैसे सेटेलाइट सब के सब लाचार तमाशा देखते रह जाते हैं। तरक्की के नाम पर हम न जाने कितने नदी नालों पर अवैध निर्माण कर डालते हैं मगर हम ये भूल जाते हैं कि ये पानी आख़िर आऐगा कहां से,कहां से होगी साफ़ पानी की पैदाईश। देश के अलग-अलग हिस्सों में धरती फटने की लगातार घट रही घटनाएं हमारे इसी प्रकृति दोहन का कुफल हैं। तेज़ गति से बढ़ रही विकास की रफ्तार ने प्रकृति से लेने के लिए तो हजार तर्क बना लिए, लेकिन उसे लौटाने की व्यवस्था न तो सामाजिक स्तर पर, और न ही सरकारी स्तर पर प्रभावी हो पाई।
       अब भी वक्त है कि प्रकृति के इस कोपभाजन से बचा जाए,जल,जंगल और ज़मीन को अमानत समझकर इसकी देखभाल की जाऐ वरना वे दिन भी दूर नहीं जब मनुष्य इन सब महत्वपूर्ण चीज़ों के लिए तरस जाऐगा। इसके लिए ख़ुद लोगों को आगे आना होगा,पर्यावरण को बचाने के लिए अगर पूरजोर लड़ाई भी लड़ी जाऐ तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अपने फ़ायदे के लिए हम आने वाली पीढ़ियों को इन सब चीज़ों से जद्दोदहद करते हुए नहीं देखना चाहते,आने वाला कल अगर सुखमय चाहते हैं तो पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना ही होगा,तभी प्रकृति के कोपभाजन से बच पाऐंगें अन्यथा नहीं।।.